एक अनकही दास्ता…

कौन अपना और कौन पराया समझ ही नहीं आता। नकाब ओढे सब है खड़े पर उनका उठाकर खुदका वैसे ही रखें या खुद का हटाकर उनका वैसे ही रहनें दे???
जलन महसूस होती हैं या दिल टूट जाने का दर्द?? पता नहीं!अपने ही जब आपसे झूठ बोलने लगते हैं, तब अपने और पराये में फर्क ही मिट जाता है। जैसे गाढ़ा दुध और पानी संमिश्रित होने पर फर्क नहीं भापा जाता।
मन की उस गहराई तक जगह देने के बाद समझ आती हैं ये बात की वे इस लायक ही नहीं थे! तो दुख होता है। चूर चूर हो जाता है वो विश्वास जो शायद ही एक तर्फा था। लोग कहते हैं उम्मीद मत रखो वरना रिश्ते की नींव गिरने का सबसे बड़ा कारण वहीं बन जाती हैं। क्या ये सच है? हम तो मनुष्यप्राणी है तो एक दूसरे की सिर्फ समानता का स्वीकार करने के साथ-साथ हम सामने वाले की विभिन्नता को स्थान क्यों नहीं देते?? बस एक बुराई के कारण अगर हम छोड़ दें रहे हैं तो बुराई हम में भी हुई।
हर एक झूठ के पीछे सच्चाई छीपी होती हैं, मीठे बोलो के पीछे सच्ची कड़वाहट और हसी के साथ दर्द। दोनों अपनी अपनी जगह पर सही होते हैं तो गलती किसकी हैं? सामने जाकर ये पूछने जाये तो उल्टा हम ही बहोत बार दोषी बन जातें है। भले ही हम पहले की गलतियों से सुधर गये हो तो भी। चूप रहकर शांति से आगे जो महाभारत चल रही होती है वो देखे या आवाज उठाकर उसके पीछे की सच्चाई उगल वाये और उन्हें हमेशा हमेशा के लिए खो दे…. समझ नहीं आता। वैसे भी सच्चाई उगल वाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। तो खुदके स्वाभिमान के लिए मन ही मन उनको त्याग के अपने लक्ष्य की तरफ आझाद पंछी बनके उड़ान भरना ही सही होगा। वरना वो तो दर दर की ठोकरें देने के लिए तैयार ही होते हैं।
तो चल पड़े अपने खुबसूरत सफर की तरफ सारे लोगो को आझाद करके और खुद को माफ करके…

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s